17 August, 2017

'धुन्ध से उठती धुन' पढ़ना फ़र्स्ट हैंड दुःख है


कुछ अंतिम स्मृतियाँ: नेशनल ग़ैलरी में कारोली फेरेनीस के असाधारण चित्र, कासल की पहाड़ियाँ, पुराने बगीचे और फव्वारे जिन्हें देखकर ऑस्ट्रीयन कवि त्राकल की कविताएँ याद हो आतीं थीं। एक दुपहर रेस्तराँ में बैठे हुए सड़कों पर लोगों को चलते हुए देखकर लगा जैसे मैं पहले भी कभी यहाँ आया हूँ…
हवा में डोलते चेरी के वृक्ष और वह कॉटेजनुमा घर, जहाँ हम इतने दिन बुदापेस्ट में रहे थे। वह होटल नहीं, किसी पुराने नवाब का क़िला जान पड़ता था। क़िले के पीछे एक बाग़ था, घने पेड़ों से घिरा हुआ, बीच में संगमरमर की एक मूर्ति खड़ी थी और बादाम के वृक्ष...यहीं पर मुझे एक कहानी सूझी थी, एक छोटे से देश का दूतावास, जहाँ सिर्फ़ तीन या चार लोग काम करते हैं…कुछ ऐसा संयोग होता है कि उनकी सरकार यह भूल जाती है कि कहीं किसी देश में उनका यह दूतावास है। बरसों से उनकी कोई ख़बर नहीं लेता…वे धीरे धीरे यह भूल जाते हैं, कि वे किस देश के प्रतिनिधि बनकर यहाँ आए थे। बूढ़े राजदूत हर शाम अपने कर्मचारियों के साथ बैठते हैं और शराब पीते हुए याद करने की कोशिश करते हैं कि यहाँ आने से पहले वह कहाँ थे।
यह कहानी है या हमारी आत्मकथा?
~ निर्मल वर्मा, धुन्ध से उठती धुन
***

मैं इस किताब को ऐसे पढ़ती हूँ जैसे किसी और के हिस्से का प्रेम मेरे नाम लिखा गया हो। नेरूदा की एक कविता की पंक्ति है, 'I love you as certain dark things are to be loved, in secret, between the shadow and the soul’। मन के अंधेरे झुटपुटे में किताब के पन्ने रचते बसते जाते हैं। मैं कहाँ कहाँ तलाशती हूँ ये शब्द। दुनिया के किस कोने में छुपी है ये किताब। मैं लिखती हूँ इसके हिस्से अपनी नोट्बुक में। हरी स्याही से। कि जैसे अपनी हैंड्रायटिंग में लिख लेने से ये शब्द ज़रा से मेरे हो जाएँगे। हमेशा की तरह।

मैं इसे दोपहर की धूप में पढ़ती हूँ लेकिन किताब मेरे सपनों में खुल जाती है। बहुत से लोगों के बीच हम मुहब्बत से इसके हिस्से पढ़ते हैं। अपनी ज़िंदगी के क़िस्सों से साथ ही तो। कहाँ ख़त्म होती है धुंध से उठती धुन और कहाँ शुरू होता है कहानियों का सिलसिला। निर्मल किन लोगों की बात करते चलते हैं इस किताब में। उनकी कहानी के किरदार कितनी जगह लुकाछिपी खेलते दिखते हैं इस धुन्ध में। 

लिखे हुए क़िस्से और जिए हुए हिस्से में कितना साम्य है। पंकज ठीक ही तो कहता है इस किताब को, Master key. यहाँ इतना क़रीब से गुंथा दिखता है कहानी और ज़िंदगी का हिस्सा कि हम भूल ही जाते हैं कि वे दो अलग अलग चीज़ें हैं। मैं इसे पढ़ते हुए धूप तापती हूँ। मेरा कैमरा कभी वो कैप्चर नहीं कर पाता जो मैं इस किताब को पढ़ते हुए होती हूँ।

धुन्ध से उठती धुन पढ़ना मुहब्बत में होना है। मुहब्बत के काले, स्याह हिस्से में। जहाँ कल्पनाओं के काले, स्याह कमरे रचे जाते हैं। ख़्वाहिशें पाली जाती हैं। जहाँ दुनियाएँ बनायीं और तोड़ी जाती हैं सिर्फ़ किसी की एक हँसी की ख़ातिर। इसे पढ़ते हुए मैं देखती हूँ वो छोटे छोटे हिस्से कि जो निर्मल की कहानियों में जस के तस आ गए। वे अगर ज़िंदा होते तो मैं डिटेल में नोट्स बनाती और पूछती चलती इस ट्रेज़र हंट के बाद कि मैंने कितने क्लू सही सही पकड़े हैं। 

कहानियाँ ज़िंदगी के पैरलेल चलती हैं। मैं लिखते हुए कितने इत्मीनान से छुपाती चलती हूँ कोई एक वाक्य, कोई एक वाक़या, किसी की शर्ट का रंग कोई। लेकिन क्या मेरे पाठकों को भी इसी तरह साफ़ दिखेंगे वे लोग जिन्हें मैंने बड़ी तबियत से अपनी कहानियों में छुपाया है? वे शहर, वे गालियाँ, वे मौसम कि जो मैंने सच में जिए हैं।

आज एक दोस्त से बात कर रही थी। कि हमें दुःख वे ही समझ आते हैं जो हम पर बीते हैं या हमारे किसी क़रीबी पर। हमें उन दुखों की तासीर ठीक ठीक समझ आ जाती है। फ़र्स्ट हैंड दुःख। धुन्ध से उठती धुन पढ़ना फ़र्स्ट हैंड दुःख है। नया, अकेला और उदास। कोई दूसरा दुःख इसके आसपास नहीं आता। कोई मुस्कान इसका हाथ नहीं थामती। तीखी ठंड में हम बर्फ़ का इंतज़ार करते हैं। मौसम विभाग ने कहा है कि आज आधी रात के पहले बारिश नहीं होगी। 

'तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो', मेरी दुनिया में इस वाक्य की कोई जगह नहीं है। मेरे डर, मेरे अंधेरे, मेरे उदास क़िस्सों में किसी की आँखे नहीं चमकतीं। कितनी बार हलक में अटका है ये वाक्य। इसलिए मैं तुम्हें सिर्फ़ उन किताबों के नाम बताउँगी जिनसे मुझे इश्क़ है। ताकि तुम उन किताबों को पढ़ते हुए कभी किसी वाक्य पर ठहरो और सोच सको कि मैंने तुम्हें वो कहानी पढ़ने को क्यूँ कहा था। 

कभी चलना किसी पहाड़ी शहर। वहाँ की पुरानी लाइब्रेरी में एक रैक पर इस किताब की कोई बहुत पुरानी कॉपी मिल जाएगी। उस समय का प्रिंट कि जब हम दोनों शायद पहली बार किसी इश्क़ में पड़ कर उसे आख़िरी इश्क़ समझ रहे होंगे। प्रेमपत्र में बिना लेखकों के नाम दिए शायरी और कविताएँ लिख रहे होंगे। ग़लतियाँ कर रहे होंगे बहुत सी, इश्क़ में। साथ में पढ़ेंगे कोई किताब, बिना समझे हुए, बड़ी बड़ी बातों को। मिलेंगे कोई दस, पंद्रह, सत्रह साल बाद एक दूसरे से, किसी ऐसे शहर में जो नदी किनारे बसा हो और जहाँ मीठे पानी के झरने हों। याद में कितना बिसर गया होगा किताब का पन्ना कोई। या कि हमारा एक दूसरे को जानना भी। फिर भी कोई याद होगी कि जो एकदम नयी और ताज़ा होगी। एक रात पहले पी कर आउट हो जाने जैसी। थोड़ी धुँधली, थोड़ी साफ़। बीच में कहीं। भूले हुए गीत का कोई टुकड़ा। 

कोई धुन, धुन्ध से उठती हुयी। 
पूछना उस दिन मौसम का हाल, मैं कहूँगी। इश्क़। 

02 August, 2017

मैं तुम्हारी शब्दगंध पहचानती हूँ

मेरी सारी इंद्रियाँ कुछ ज़्यादा ही तेज़ हैं सिवाए नज़र के। आँखों पर चश्मा चढ़ा है तो दिखता कम है। लेकिन जितना दिखता है वो बहुत से डिटेल्ज़ के साथ सहेज दिया जाता है। कभी कभी मैं बिना चश्मे के चलना चाहती हूँ। पूरी धुँधली सी दुनिया की ख़ूबसूरती में भीगती हुई। बेतरह।

मैंने पहली बार तुम्हें तुम्हारे शब्दों से पहचाना था। उन शब्दों का चेहरा नहीं था। वे अंधेरे के शब्द थे। किसी पहाड़ी गुफ़ा में मीठे पानी के झरने की तरह। उनका होना दिखायी नहीं, सुनायी पड़ता था। उनका होना प्यास को पुकारता था। मैंने उन्हें छू कर जाना कि शब्दों से धुल जाती है थकान। पानी की तरावट समझने के लिए तुम्हें गर्मियाँ समझनी होंगी। या कि किसी के कॉटन दुपट्टे की छुअन। किसी पहाड़ी झरने के पानी से आँखें धो लो और फिर माँगो उस लड़की का दुपट्टा, चेहरा पोंछने के लिए। या कि उसकी साड़ी का आँचल ही। एक गंध होती है। गीले कपास में। उस गंध से यक़ीन आता है कि प्यास का प्रेत हमारा पीछा नहीं कर रहा। 

मेरे पास उस वक़्त बस इक छोटी सी बॉटल थी पास में। मैंने उसमें झरने का मीठा पानी भरा और सालों उसे देख कर इस बात का यक़ीन दिलाती रही ख़ुद को कि एक अंधेरी गुफ़ा में टटोल कर, पानी की आवाज़ तक पहुँची थी। बिना आँखों देखा सिर्फ़ स्वाद के भरोसे पानी पिया था और प्यास को मिटते हुए महसूसा था। उस भरी भरी सी पानी की बॉटल का होना एक मीठी याद थी। बस एक मीठी याद।

इक रोज़ यूँ हुआ कि किसी नए शहर में घूमते हुए रात हो गयी और शहर की सारी दुकानें बंद। आख़िर ट्रेन जा चुकी थी और मेरा होटल रूम वहाँ से दो मील दूर था। मेरे जूते कंफर्टेबल थे कि मैं विदेश में टहलते हुए हमेशा स्पोर्ट्स शूज पहनती हूँ पर उस रात मैंने ज़मीन की कुछ बातें सुननी चाही थीं। पानी की भी। इक नदी बहती थी शहर के दो टुकड़े करती हुयी। या कि शहर के दो टुकड़े जोड़ती हुयी। जैसा तुम सोचना चाहो। मैं नदी किनारे बैठी। जूते उतारे और ठंढे पानी में पैर डाल दिए। इक किताब थी मेरे बैग में। हमेशा की तरह। नदी ने कहा मेरे पास बंद किताबों की कहानियाँ नहीं आयी हैं कभी। तो मैंने उसे कहानियाँ सुनायीं। वो फिर तुम्हारी आवाज़ की मिठास चखना चाहती थी। मैंने बोतल से निकाल कर थोड़ा सा पानी नदी में बह जाने दिया। उस रोज़ मैंने पहली बार महसूसा था कि तुम पर मेरा हक़ कुछ भी नहीं। कि शब्दों पर हक़ सबका होता है। नदी, आसमान, पंछी का भी। मैं सिर्फ़ अपनी प्यास के लिए तुम्हारे शब्द बोतल में भर कर नहीं घूम सकती थी। उस दिन मैंने तुमसे उदार होना सीखा था। 

मगर जो शब्द तुम्हें मेरे लिए परिभाषित करता है, वो शब्द शायद तुम्हारे पास इतनी बहुतायत में है कि तुम्हें मालूम भी नहीं चला होगा कि कब मैंने दिन दहाड़े तुम्हारी नोट्बुक से एक पन्ना अपने लिए फाड़ लिया था। बड़े हक़ के साथ। कि तुम्हारे पास इस शब्द के कई रंग हैं। एक ज़रा सा हिस्सा मुझे भी दो। मैंने इसकी ग्राफ़्टिंग करूँगी। अपने पागलपन में ज़रा सा तुम्हारा 'kind' होना। कि तुम तो एकदम ही one of a kind हो। शायद चुप्पी की शाख़ पर खिल ही जाए मुस्कान की नन्ही कली कोई। या कि ठहाकों के काँटे उग आएँ। या इश्क़ का वर्जित फल। शब्द बड़े मायावी होते हैं। इनकी ठीक ठीक तासीर कोई भी तो नहीं जानता।  

It's a cold and cruel world, my friend. तुम्हारे शब्दों की सबसे ख़ास बात क्या है मालूम? They are kind. तुम्हारी तरह। तुम्हारे हाथों में ये शब्दगंध रहती है। तुम्हारे क़ातिल हाथों में। कि तुम्हारे हाथ तो फ़रिश्ते के हाथ हैं। तुम्हारे साफ़ दिल से भेजा जाता है उजले, पाक शब्दों में धुले, घुले इरादे। क़त्ल के। क़त्ल करने के लिए वे घंटों जिरह नहीं करते। कोर्ट केस नहीं करते। सान जो चढ़ा रक्खि है तुमने उन पर। इतनी तीखी। वे सीधा क़त्ल करते हैं। बस। एक ही लम्हे में। केस क्लोज़्ड।

तुम्हारी शब्दगंध। नींद में आती है दबे पाँव। जाग में आती है पायल की महीन झमक में। काँच की चूड़ियों में। टूटते हुए काँच दिल की छन्न में। बस कभी कभी होता है, कि शब्दगंध की जगह तुम ख़ुद चले आते हो। 

तुम ऐसे मत आया करो। मुझे तुमसे नहीं, तुम्हारे शब्दों से नहीं...अपने इस कोल्ड, क्रूअल दिल से डर लगता है। 
कि तुमसे मिल कर मेरा भी तुम्हारी तरह काइंड बनने का दिल करने लगता है। 
तुम्हारी तरह हँसने का भी।
वे दिन - निर्मल वर्मा 
***
Prequel
***

"तुम रातों को ऐसी बेपरवाही से ख़र्च कैसे कर सकती हो?"
"ये कैसा सवाल है। ठीक से पूछो वरना मैं कुछ जवाब नहीं दे रही,।"
"तुम रातों को ऐसे बेपरवाही से बर्बाद कैसे कर सकती हो? ख़ुश?"
"हाँ, अब ठीक है। वो इसलिए कि रातें मेरी अपनी होती हैं। चुरायी हुयीं। मैं अपनी नींद से मोहलत चुराती हूँ। तुम्हें मालूम मैं कितने घंटे सो रही आजकल?"
"नहीं। कितने?"
"तीन"
"नींद की कमी से मर सकते हैं लोग, मालूम है ना तुम्हें?"
"नहीं। सब कुछ तो बस, तुम्हें ही मालूम है"
"क्या करती हो रात भर जाग जाग के"
"पढ़ती हूँ, निर्मल वर्मा की 'वे दिन', बचा बचा के...और रचती हूँ वैसे शहर जिनमें तुम्हें मुझसे मिलना चाहिए"
"क्यूँ, इस शहर में क्या ख़राबी है?"
"इस शहर में मेरी पसंद के गीत नहीं बजते"
"तुम्हारी पसंद बदलती रहती है"
"धुनों की...लेकिन एक बात कभी नहीं बदलती। मुझे लिरिक्स बहुत अच्छे लगने चाहिए"
"तुम्हें शब्द मार डालेंगे"
"उफ़! ये हुयी कोई हसीन मौत, किसी कविता के हाथों मर जाना! नहीं?"
"बिलकुल नहीं। धरो किताब और जाओ सोने।"
"अच्छा, लास्ट बार, तुम अपनी पसंद का एक शहर चुन लो कि जिसमें मैं तुमसे मिल सकूँ। मैं अपनी पसंद का कोई शहर लिखूँगी तो उसमें तुम्हारी पसंद की ड्रिंक्स नहीं मिलेंगी।"
"तुम मुझे पहचान लोगी उस नए शहर में, कि जहाँ सब कुछ नया होगा"
"तुम्हें क्या लगता है, मैं तुम्हें कैसे पहचानती हूँ? तुम्हारी आँखों, तुम्हारी हँसी या कि तुम्हारे कपड़ों से?"
"पता नहीं। तुम ही बताओ"
"मैं तुम्हें तुम्हारी शब्दगंध से पहचानती हूँ।"

किसी से प्रेम किए बिना उसका दिल तोड़ना गुनाह है

दिन भर अस्पताल में बीता था। दुखते हुए टेस्ट। ये वो इग्ज़ैमिनेशंज़ नहीं थे जिन्हें पास करने या टॉप करने के लिए ख़ूब सी मेहनत करनी होती। ढंग के नोट्स बनाने होते। या क्लास में समय पर जा कर अटेंडन्स ही पूरी करनी होती। ये वो टेस्ट थे जो ज़िंदगी बिना किसी तैय्यारी के ले लेती है।

अस्पताल शायद किसी को भी अच्छे नहीं लगते होंगे। वहाँ की एक अजीब सी गंध होती है। मुर्दा गंध को ढकने वाली गंध। जैसे बिना नहाए लोग डीओ लगा लेते हैं और और भी ज़्यादा बिसाएन महकते हैं। ये ठीक ठीक गंध नहीं है। ये उस जगह का बहुत सा दुःख और अवसाद का सांद्र एनर्जी फ़ील्ड है। ये गंध से ज़्यादा महसूस होता है। ख़ास तौर से मुझे। मैं नॉर्मली हॉस्पिटल के रूट ट्रैवल में भी अवोईड करती हूँ। 

झक सफ़ेद रौशनी। एकदम सफ़ेद ब्लीच की हुयी चादरें। परदे। सब बिलकुल सफ़ेद। मगर यही सफ़ेद चादरें फ़ाइव स्टार होटल में होती हैं तो सुकून का बायस बनती हैं। उल्लास का। छुट्टियों का। मगर यही सफ़ेद हॉस्पिटल में दिखता है तो मन से सारे रंग सोख लेना चाहता है। 

वहाँ बहुत से बेड्ज़ लगे थे। हर बेड के इर्द गिर्द परदे। मेरे बग़ल वाले बेड पर आयी औरत रो रही थी। उसकी सिसकी मुझे सुनायी पड़ रही थी। कुछ इस तरह कि लग रहा था उसके आँसुओं का गीलापन मेरे पैरों तक पहुँच रहा है और मेरे तलवे ठंढे कर रहा है। मुझे ठंढे होते हुए पैर बिलकुल अच्छे नहीं लगते। मुझे उनसे हमेशा मम्मी की याद आती है। लेकिन इन दिनों मेरा पूरा बदन गरम रहता है, सिर्फ़ तलवे ठंढे पड़ने लगे हैं। मुझे ऐसा भी लगता है कि ज़मीन का लगाव कम रहा है मेरे प्रति। उसकी ऊष्मा मेरे तलवों तक नहीं पहुँचती। उसे मेरा ज़मीन पर नंगे पाँव चलना नहीं पसंद। या शायद मैं उड़ने लगी हूँ और मेरे पैरों को हवा से गरमी सोखना नहीं आता। 

मेरे हर ओर सिर्फ़ सफ़ेद था। कोई भी रंग नहीं। हॉस्पिटल के गाउन में भी कितना दर्द होता है। बदन पर डालते ही लगता है कितनी आहें और सिसकियाँ इसमें घुली होंगी। किसी सर्फ़ या ब्लीच से फ़ीलिंज़ थोड़े ना धुल जाती हैं। एसी बहुत ठंढा था। मेरे पास किताबें थीं। नोट्बुक थी। मोबाइल भी था। कुछ देर पढ़ने के बाद मैंने सब कुछ अलग रख दिया। मुझे वैसे भी मर जाने का बहुत डर लगता है। फ़ॉर्म भी तो साईन करवाते हैं। कि मैं मर गयी तो हॉस्पिटल ज़िम्मेदार नहीं होगा। वग़ैरह। यूँ ही। सवाल पूछो तो कहेंगे प्रोटोकॉल है। मतलब मज़े मज़े में पूछ लिया कि साहब आप मर गए तो हमारी ग़लती नहीं है। 

मैं भी यूँ ही लोगों से फ़ॉर्म भरवा लिया करूँ मिलते साथ…इश्क़ हो जाए तो मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। इन फ़ैक्ट मेरी कोई ज़िम्मेदारी कभी नहीं होनी चाहिए। नाबालिग़ तो होते नहीं लोग। कि मैंने फुसला लिया। जान बूझ कर आपको पुल से नीचे बहते दरिया में कूद के जान देनी है तो शौक़ से दीजिए ना। बस मेरे लिए एक आख़िरी चिट्ठी छोड़ जाइए कि हम दिखा सकें लोगों को कि मैंने अपना फ़र्ज़ निभाया था। वॉर्निंग भी दी थी। बचाने के लिए लाइफ़बोट भी भेजी थी। अब कोई मेरे इश्क़ से बचने के लिए मौत के गले पड़ जाए तो मैं क्या करूँ।
मौत। कहाँ कहाँ मिलती है। अपनी ठंढी उँगलियाँ भोंक देती है मेरे सीने में। दिल में छेद होकर सारा इश्क़ ख़ुमार बह जाए, सो भी नहीं होता। बस तड़प कहाँ होनी चाहिए, उसी की शिनाख्त करती है मौत। मेरे साथ और भी चार-छः लोग गए थे अंदर। सबके चेहरे पर क़ब्ज़ा जमाए बैठी थी मौत। जैसे जाने अंदर यमराज ख़ुद अपना भैंसा लेकर खड़े हों और बाँध कर ले ही जाएँगे। मैं हँस रही थी। पागलों की तरह। अश्लील हँसी। कि हस्पताल में नियम है कि मुर्दा शक्ल बना के घूमो। वहाँ ऐसे बेपरवाह होकर हँसना गुनाह ही था। ऐसा नहीं है कि मुझे दर्द नहीं होता। लेकिन फ़िज़िकल पेन के प्रति मेरा स्टैमिना बहुत ज़्यादा है। बर्दाश्त की हद ज़्यादा। बाएँ काँधे में हड्डी टूटी थी तो भी अपनी काइनेटिक फ़्लाइट ख़ुद ही राइड करके वहाँ से घर आयी थी। बिना किसी मदद के। घर आके पूरे घर में जो पैर के ज़ख़्म से ख़ून बहता आया था, उसे पोछे के कपड़े से पोछा था। सो दुखता है तो बस गहरी साँस लेती हूँ। इंतज़ार करती हूँ कि दर्द ख़त्म हो जाएगा। 

पर यहीं ज़रा मेरा दिल तोड़ के देखो। हफ़्तों खाना पानी बंद हो जाएगा। तोड़ना तो छोड़ो, खरोंच लगा के देखो ज़रा मेरे दिल पर। उसी में रोना धोना और चूल्लु भर पानी ढूँढ के मर जाना, सब कर लूँगी। ज़ुबान पर मेटल का टेस्ट आ रहा है। लोहे जैसा। काँसे जैसा। धातु। मुट्ठी भर दवाइयाँ हैं। निगलते निगलते परेशान। मेरे दिमाग़ दिल का उपाय क्यूँ नहीं होता इन डाक्टर्ज़ के पास। पूछूँ कि मेरा मन क्यूँ दुखता है? ये रात भर नींद क्यूँ नहीं आती। ग़लत लोगों से इश्क़ क्यूँ होता है? जिन्हें भूल जाना चाहिए, उनके नाम दिल में ज़मीन क्यूँ लिख देती हूँ। डॉक्टर ये भी तो बताएँ कि इश्क़ घूम घूम कर क्यूँ आता है जीवन में। लम्हे भर का। घंटे भर का। शाम भर का। 

तुम्हारा इश्क़ मेरा नाम पुकारता है। जैसे देर रात बेमौसम कूकती है कोई अकेली कोयल। ऐसी हूक कि जिसका कोई जवाब नहीं से नहीं आता। मैं क्या करूँ। हम दोनों के बीच कितने सारे शब्द हो जाते हैं। लेकिन शब्द बेतरतीब किसी जंगल की तरह नहीं उगते कि मैं तुम तक पहुँच नहीं पाऊँ। ना ही कोई पहाड़ या कि घाटी बनते हैं। शब्द मेरे तुम्हारे बीच नदी बनते हैं। पुल बनते हैं। बह जाने का गीत बनते हैं। मैं तुम्हारे लड़कपन की तस्वीरों के साथ अपनी ब्लैक एंड वाइट फ़ोटो साथ में रखती हूँ और सोचती हूँ हम ग़लत वक़्त में मिले। हमें तब मिलना था जब मेरा दिल थोड़ा कम टूटा था और तुम थोड़े ज़्यादा बेपरवाह हुआ करते थे। 

तुम्हें मालूम है मुझे तुमसे कितनी बातें करनी हैं? मैं हर मौसम के हर शाम की कोई तस्वीर खींचना चाहती हूँ सिर्फ़ तुम्हारे लिए। गुनगुना देना चाहती हूँ कोई मुहब्बत में डूबा गीत। ख़त लिखना चाहती हूँ तुम्हें। इश्क़ कोई देश है। कोई शहर। गली। मुहल्ला कोई? कमरा है तुम्हारे दिल का…ख़ाली?

कितने शब्द लिखे गए हैं हमारे नाम से? कितनी किताबें हो जाती उन चिट्ठियों को जोड़ कर जो मेरे ख़याल में उगी लेकिन काग़ज़ पर मार दी गयीं। इस वायलेन्स के लिए कोई प्रोटेस्ट क्यूँ नहीं करता? 

ये बदन टूट फूट गया है। कोई कबाड़ी इसे किलो के भाव से तोलेगा इसलिए जब दिल्ली आती हूँ भर मन छोले कुलचे खाती हूँ। आइसक्रीम जाड़ों में। कोहरे में जिलेबी।

रूह में भी दरारें हैं। मेरे लिए महीन शब्द लिखो और गुनगुनाहट की कोई धुन। सिल दो ये बिखरा बिखरा लिबास। ज़रा देर को तुम्हारे काँधे पर सर रख लूँ। थक गयी हूँ। 

मुझे नहीं मालूम मेरे मर जाने पर कितने लोग मुझे कैसे याद रखेंगे। मगर मैं चाहूँगी तुम मुझे एक अफ़सोस की तरह याद रखो। एक जलते, दुखते, ज़िंदा अफ़सोस की तरह। कि तुम तो जानते हो। अफ़सोस की उम्र ज़िंदगी से कहीं ज़्यादा होती है। 

तुम मेरी ज़िंदगी में कभी नहीं रहे लेकिन मैं तुम्हें ऐसे मिस करती हूँ जैसे इक उम्र बिता कर गए हो तुम। रूठ कर। 

किसी किताब के पहले पन्ने पर कुछ भी लिखना गुनाह है। 
किसी से प्रेम किए बिना उसका दिल तोड़ना भी।

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