06 July, 2017

एक ख़त पाठकों के नाम

प्रिय (और अप्रिय) पाठकों।

जब आप मुझसे कुछ बेहतर लेखक होने की चाह रखते हैं, तो ये समझिए कि मैं भी आपसे बेहतर पाठक होने की चाह रखती हूँ। अच्छे लेखक विरले हैं अगर तो अच्छे पाठक और भी विरले हैं।

आप मुझसे किताबों पर बात कीजिए। आप इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं। उसमें क्या अच्छा लगा। किरदारों की बुनावट में कौन सी चीज़ें अच्छी लगती हैं। क्या कोई बहुत सुंदर और नया बिम्ब दिखा किसी लेखन में।

कला के कई आयाम होते हैं। गीत और संगीत बहुत हद तक आसान होता है। कोई गीत एकदम अलग सा हो। कोई संगीतकार कि जो बहुत पॉप्युलर ना हो। मैंने गाने बहुत कम सुने हैं और वाक़ई जो सुने हैं दोस्तों के बताए, सुनाए या लिखाए गए ही हैं। आपको कोई संगीतकार बहुत अच्छा लगता है, कोई बैंड बहुत पसंद है। आप कह सकते हैं उस बारे में। मेरा इन्बाक्स खुला है।

पेंटिंग थोड़ी मुश्किल भाषा है। इसके कूटशब्द सब जगह नहीं मिलते। मैं सिर्फ़ इतना ही कहूँगी कि किसी पेंटिंग को उसका प्रिंट देख कर समझ पाना मुश्किल है। उसके लिए सच की पेंटिंग देखनी होती है। यहाँ शब्दों की जगह नहीं होती। आपको जो पेंटिंग पसंद है, आप ख़ुद ही उसकी कहानी सुन सकेंगे। चुपचाप। आप वो रंग होते जाएँगे कि जो कैनवास का हिस्सा हैं।

मैंने इस पेज को कुछ साल पहले बनाया था। मैं इसे रफ़ कॉपी की तरह इस्तेमाल करती हूँ। बिना सोचे समझे, बिना ज़्यादा सेंसर किए चीज़ें रखती हूँ। कि ये कच्चा माल है। अच्छा लिखने का एक ही तरीक़ा मुझे समझ में आता है। लिखते जाना। सिर्फ़ सोच कर मैं अच्छा नहीं लिख सकती।

लिखते हुए शब्दों पर ध्यान दें। रैंडम चीज़ें ना लिखें। सिर्फ़ अच्छा और बुरे से आगे बढ़ कर अपनी बातों को ज़्यादा स्पष्ट तरीक़े से कहें।

आख़िरी बात। मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिए लिखती हूँ। ये बात बदलने वाली नहीं है। लिखने पर बिन माँगी सलाह से मेरा दिमाग़ ख़राब होता है। मुझे वाक़ई ग़ुस्सा आता है। कोई भी लेखक अपने पाठकों के हिसाब से नहीं लिखता। वो लिखता है कि उसके अंदर कोई कहानी होती है जो कहा जाना माँगती है।

पाठक होने की विनम्रता होनी चाहिए। मैं ये इसलिए कह रही हूँ कि मैं लेखक होने के कई साल पहले और अभी भी, सबसे पहले एक पाठक हूँ। अपने पसंद के लेखकों के प्रति एक सम्मान और कृतज्ञता से भरी रही हूँ। लिखना मुश्किल होता है। हर लेखक के लिए। आप किसी भी लेखक या कलाकार की जीवनी उठा कर पढ़ लीजिए। भयानक उथल पुथल से भरी मिलेगी। आंतरिक और बाह्य, दोनों। सारी मेहनत उस कलाकार की है। आप सिर्फ़ ग्रहण कर रहे हैं। याचक भाव से। हथेली फैलाइए।

मैं लेखक पाठक दोनों हूँ। पाठक होते हुए मैं भी याचक की मुद्रा में होती हूँ। बात मेरे पसंद के मंटो की हो, रेणु की हो, JK रोलिंग की हो, मुराकामी की हो, लोर्का की हो, सिंबोर्सका की हो, स्वदेश दीपक की हो। मैं इनके सामने ज़मीन पर होती हूँ। ये आसमान में चमक रहे होते हैं।

लेकिन जब मैं लेखक होती हूँ तो एक पाठक से बढ़ कर होती हूँ कि मेरा होना आपके होने से स्वतंत्र है। लेखक ना हों तो पाठक का अस्तित्व नहीं होता। लेकिन पाठक ना हों तो भी लेखक लिखता है।

आपका कोई अधिकार नहीं है। ना मेरे लिखे पर। ना मेरे जीवन पर।

चपलम समरपयामी

कभी कभी कमाल का मूड होता है। आज व्यंग्य लिखने का मन कर रहा है। 

ऐसा कुछ लिखने की दो वजह हो सकती है। पहली तो सिम्पल कि हम आजकल शायरी पढ़ रहे हैं। दूसरा ये कि एक दोस्त के यहाँ जाने पर उसकी चप्पल माँग के पहने। क़सम से चप्पल देखते ही पटना के हनुमान मंदिर के आगे वाला चप्पल का ढेर याद आ गया। वो चप्पल हंडरेड परसेंट वहीं से उड़ाया गया था। 

तो इन दिनों के कौंबिनेशन से दिमाग़ में अजीब अजीब ख़याल और इमेजेस उभर रहे हैं। कि जैसे एक शायरी का मंच हो। मंच के ऊपर बड़ा सा पोस्टर लिखा हो। 'मंच पर फेंके गए जूते चप्पल ज़ब्त कर लिए जाएँगे और धारक(फेंकक) को वापस नहीं मिलेंगे। समझदार लोग इसका भी जोड़ तोड़ निकाल लेंगे। वे सिर्फ़ एक पैर का जूता फेंकेंगे। इसके बाद सिंडरेला की तरह हर जूते का जोड़ा खोजा जाएगा। लोग कवि सम्मेलनों/मुशायरे के पहले whatsapp ग्रूप पर मेसेज भेज कर साथ में डिसाइड करेंगे कि इस बार लेफ़्ट पैर का जूता फेंकना है या राइट पैर का। कहीं ऐसा ना हो कि आपका दायाँ जूता और किसी और का बायाँ जूता मैच हो जाए और मुफ़्त में ही संचालकों का या कि शायर का ही फ़ायदा हो जाए। ग़लती से किसी का फ़ायदा हो जाए, इससे बड़ा धोखा क्या होगा इस जाहिल वक़्त में। इतने ख़राब दिन आ जाएँ आपके तो आप अगले मुशायरे में श्रोता बनने की जगह शायर ना हो जाएँ भला। बतलाइए! 

शहर में बड़ा मुशायरा होने के पहले मंदिर के आगे से चप्पल चोरी होने की घटनाओं में ताबड़तोड़ वृद्धि होने लगे। लोग मुशायरे में नंगे पैर जाएँ...जाने की असली वजह ये हो कि आख़िर में अपना खोया हुआ चप्पल तलाश के वापस ला सकें। मुशायरे के बाद। बेजोड़ी जूतों की सेल लगे और जैसे समझदार गृहिणी मार्केट के बचे हुयी सब्ज़ी में से छाँट के सबसे अच्छी और सस्ती सब्ज़ियाँ घर ले जाती है उसी तरह समझदार श्रोता उस चप्पलों/जूतों के महासमुद्र में जोड़ा छाँट लें। पूरी पूरी जोड़ी तो मियाँ बीबी की भी नहीं मिलती। कहीं ना कहीं कॉम्प्रॉमायज़ करना ही पड़ता है। फिर जूतों में कौन से छत्तीस गुण मिलने हैं। 

इस तरह के मुशायरों का असर हर ओर पड़ने की सम्भावना है। इससे शहर का फ़ैसन बदलेगा। अलग अलग जूते पहनना सम्मान की निशानी मानी जाएगी। सही समय पर दाद देना एक कला है। चप्पल सद्गति को प्राप्त होगी। सही समय पर, सही निशाने से, सही गति और दिशा में मारी गयी चप्पल अपने अंजाम तक पहुँचेगी। लोगों में भाईचारा बढ़ेगा। वसुधैव कुटुंबकम वाली फ़ीलिंग आएगी। जो आज मेरा है वो कल किसी और का होगा और किसी का जो है वो मेरा हो सकता है। लोग अड़ोसी पड़ोसी को अच्छी चप्पलें ख़रीदवाएँगे। 

मार्केट में नयी स्टडीज़ आएँगी। शायर लोगों का कॉन्फ़िडेन्स इस बात से डिसाइड होगा कि किसके शेर पढ़ने पर कितने लोगों ने कितना फेंका। चप्पल। जूता वग़ैरह। फेंकने शब्द को नया आयाम मिलेगा।
वग़ैरह वग़ैरह। 

***
PS: हमको मालूम नहीं है कि हम बौराए काहे हैं। लेकिन जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं। इस दीवाल पर जूता चप्पल फेंकने का कोई फ़ायदा नहीं है। लिखाई पढ़ाई होती रहती है। पसंद ना आए तो दूसरे पन्ने पर चले जाइए। श्रद्धा आपकी। कपूर भी आपका। ख़ैर।
हमको लगता है हम पगला गए हैं। 

PPS: मन तो कर रहा है साथ में अपने ही चप्पल का फ़ोटो साट दें, लेकिन घर में ऐसा फटेहाल कोई चप्पल है नहीं। बाद में एडिट करके चिपकाएँगे।

19 June, 2017

मृत्यु की न दुखने वाली तीन कहानियाँ

शीर्षकहीन 

मेरी मृत्यु को नकारो मत। उच्चारो इसे, 'मैं मर जाऊँगी जल्दी ही'। दर्द की उठती जिस रेख से मैं तुम्हारा नाम लिखा करती थी अब उससे सिर्फ़ मृत्यु के आह्वान के मंत्र लिखती हूँ। मृत्यु तुम्हारा रक़ीब है। मैं उससे कहती हूँ कि समय की इस गहरी नदी को जल्दी से पार कर ले और मुझे आलिंगन में भींच ले। मृत्यु का हठ है कि मैं उसके लिए कविताओं की पाल वाली नाव लिख दूँ। मेरे मंत्रों में इतनी टीस होती है कि उसका ध्यान भटक जाता है और वह बार बार समय की नदी के उलटे बहाव में दूसरी ओर बह जाता है। समय भी तुम्हारा रक़ीब है शायद।

तुम्हारी इच्छा है और अगर सामर्थ्य है तो इस आसन्न मृत्यु से लड़ने के लिए आयुध तैय्यार करो। मेरे हृदय को सात सुरक्षा दीवारों वाले अभेद्य क़िले में बदल दो। मेरे इर्द गिर्द प्रेम के तिलिस्म बुनो। वो भी ना हो सके तो नागफनी का जंगल तो उगा ही दो कि मृत्यु की उँगलियाँ मुझे छूने में लहूलुहान हो जाएँ और वो उनके दर्द से तिलमिला कर कुछ दिनों के लिए मेरा हाथ छोड़ दे।

मेरे पैरों के इर्द गिर्द सप्तसिंधु बहती हैं। मेरे तलवे हमेशा ठंढे रहते हैं। तुम इतना ही करो कि मेरे तलवों को थोड़ा अपनी हथेलियों से रगड़ कर गर्म कर दो। तुमने कहा तो था कि तुम आग की कविताएँ लिखते हो। तुम्हारी हथेलियों में ज्वालामुखी हैं।

मुझे समंदर भी शरण नहीं देता। मुझे रास्ते भी छल लेते हैं। मैं इतने सालों की बंजारन, बिना रास्तों के कहाँ जाऊँ? मेरे प्रायश्चित्त का किसी वेद में विधान नहीं है, सिर्फ़ दंड है, मृत्युदंड।

शायद मैंने ही तुमसे कुछ ज़्यादा माँग लिया। बर्फ़ हुए पैरों की अभिशप्त बंजारन सिर्फ़ मृत्यु का प्रणय निवेदन स्वीकार सकती है। मृत्यु। मेरा प्रेम, मेरा पंच परमेश्वर। मेरा वधिक।

बस इतना करो कि इन आँखों को एक बार आसमान भर पलाश देखने की इच्छा है…इस अंतिम समय में, मेरी खिड़की पर…टहकते टेसु के रंग में फूल जाओ…

***
स्टिल्बॉर्न 
कुछ शब्दों का दर्द परायी भाषा में भी इतना घातक होता है कि हम अपनी भाषा में उसे छूना नहीं चाहते। उसकी प्राणरक्षा के लिए उसके शरीर में मरे हुए बच्चे को DNC से निकाला गया था। छोटे छोटे टुकड़ों में काट कर।

कोई उसकी बात नहीं मानता कि समंदर हत्यारा है। हर बार गर्भपात होने की पहली रात वो समंदर का सपना देखती।

तुम्हें कभी नहीं कहना चाहिए था कि तुम्हें मेरे किरदारों से इश्क़ हो जाता है। तुम मेरे किरदारों के बारे में कुछ नहीं जानते। मुझे नफ़रत है तुम्हारे जैसे लोगों से। तुम्हें छू कर लिजलिजा हो जाता है मेरा लिखने का कमरा। मैं तुम्हारे ख़त जला दूँगी।

तुम इतने उजले शहर में कैसे रह सकते हो? कौन भरता है तुम्हारी आत्मा में उजाला हर रोज़। कहाँ दफ़्न करके आते हो तुम अपने गुनाहों की लिस्ट? किसके सीने में छिपे हैं तुम्हारे घिनौने राज?

औरत ने कपड़ों में सूखे हुए रक्त को धोया नहीं। ख़ून में रंगी हुयी चादरें किसी नदी में नहीं बहायी गयीं। उसके अजन्मे बच्चों की आत्मा उसकी नींद में उससे मिलने आती। वो गूगल कर के पढ़ती कि कितने महीने में बच्चों के अंदर आत्मा आ जाती है मगर गूगल के पास ऐसे जवाब नहीं होते। जवाब होते भी तो उसे उनपर यक़ीन नहीं होता। ये बात शायद किसी पुराण, किसी वेद, किसी स्मृति में लिखी हो। लेकिन वो एकदम साधारण स्त्री थी। उसके पास इतना कुछ समझने को अक़्ल नहीं थी। कोई ऐसा था नहीं प्रकाण्ड पंडित कि उसे बता दे ठीक ठीक कि जो बच्चे जन्म नहीं लेते उनकी आत्मा की शुद्धि हो सकती है या नहीं।

वो टुकड़ा टुकड़ा अपने बच्चों का चेहरा अपने मन में बना रही होती। आँखें। नाक। होंठ। सिर के बाल। लम्बाई। रंग। वज़न। उसकी आवाज़। उसकी हँसी। जिन दिनों वह गर्भवती होती उसकी आँखों में दो रंग दिखते। एक वर्तमान का। एक भविष्य का। दूसरी DNC के पूरे साल भर बाद उसे गर्भ ठहरा था। इस बार उसने कोई सपने नहीं देखे। इस बार बच्चों को देख कर वो ख़ुशी या अचरज नहीं, दहशत से भर जाती। हर गुज़रते महीने के साथ उसकी आँखों का अंधकार और गहराता गया। नवें महीने तो ये हाल था कि पूजाघर में फ़र्श पर बैठ कर पूजा भी नहीं कर पाती थी।
लेबर पेन के पहले ही डॉक्टर ने उसे अड्मिट करा लिया। वो कोई चांस नहीं लेना चाहती थी। सिजेरियन ओपेरेशन के बाद जब उसे होश आया तो बेड के इर्द गिर्द सब लोग जमा थे मगर चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसके पति ने जब उसे उसकी माँ के मर जाने की ख़बर दी थी, तब उसने उसकी आँखों में इतना अँधेरा पहली बार देखा था। उसके कान में बच्चे की आवाज़ गूँज रही थी। किलकारियाँ। आँखें। रंग। बाल। मुस्कान।

बिस्तर के बग़ल में टेबल पर एक सफ़ेद पोटली रखी थी। डॉक्टर ने कहा। ‘स्टिल बॉर्न’। औरत को इस टर्म का मतलब पता नहीं था। उसने पति की ओर देखा। पति ने टेबल से पोटली उठा कर उसके हाथ में रख दी। बच्चा गोरा एकदम। चेहरा बिलकुल औरत से मिलता। बाल काले। आँखें बंद। और साँस नहीं। नर्स ने भावहीन और कठोर आवाज़ में कहा, ‘मैडम बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ है’। औरत चुप।

इसमें किससे कहे कि मृत बच्चे की पलकें खोल दे। वो उसकी आँखों का रंग देखना चाहती है।


***

Vigilante
मालूम हिंदी में ऐसा कोई शब्द क्यूँ नहीं है? क्यूँकि हमारे देश में अच्छा काम करने के बाद छुपने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हालाँकि हिंदी फ़िल्मों में कुछ और दिखाया जाता है। लेकिन समाज का सच ये है कि अच्छा करने वाले लोग डंके की चोट पर काम करते हैं। मर भी जाते हैं ऐसे।

उसका नाम नहीं दे सकती। मेट्रो में मिला था मुझे। उसकी आँखों में एक मासूम वहशत थी। छोटे, क़ातिल बच्चों में जैसी होती है। वैसी। क्या? आपने बच्चों के क़ातिल इरादे नहीं देखे? किसी बच्चे को कुत्ते के पिल्ले को मार देते देखा है? पानी में डुबो कर? गरम पानी में? आपको क्या लगा ये उसकी मासूमियत है? उसे सब मालूम था। वो बस मौत को चख रहा था। उसे छेड़ रहा था। अपना साइडकिक बनाने को। जैसे बैटमैन का है ना- रॉबिन। वैसे ही, कि जो काम उससे ना हो सकें, वे मौत के ज़िम्मे सौंप दे…छोटे छोटे क़त्ल। प्राकृतिक क़त्ल। जैसे पानी में किसी को फेंक देने के बाद उसे बचाने ना जाना जैसे- सीधे- साधारण- बोरिंग।

उसकी आँखें देख कर लगा कि उसे क़त्ल के ऊपर मासूमियत का पर्दा डालना आता है। चुप्पा लड़का। इंट्रोवर्ट जैसा। भीड़ में गुम हो जाने का खेल गिरगिट से सीखता। Camouflage.  उसका चेहरा ऐसा आइना था जिसमें सिर्फ़ एक क़ातिल अपना चेहरा देख सकता था। मुझे वो दिखा कि मुझे बहुत सालों से उसकी तलाश थी। मैं जानती ये भी थी कि उसे भी मेरी तलाश थी। एक कंफ़ेशन बॉक्स की नहीं…एक ऐसे साथी की जो उसके डार्क ह्यूमर के पीछे का सच जनता हो। जिसे मालूम हो कि कोई भी लतीफ़ा सच की पहली सुराख़ है और अगर मैं उसे सही तरीक़े से प्रोत्साहन दे सकूँ तो मुझे अपने क़त्ल करने के तरीक़े से अवगत कराएगा। मैंने बहुत ख़ूनी देखे थे। लेकिन उसके जैसा मासूम ख़ूनी कोई नहीं देखा था। उसके हाथों पर ख़ून का एक भी धब्बा नहीं था। उसकी आत्मा पर भी नहीं।

आपको लगता है कि आपने वहशत देखी है? कि आप ख़ूनी को भीड़ में पहचान सकते हैं। नहीं साहब। वे पारदर्शी आँखों वाले लोग होते हैं। उनकी आँखों से उनकी रूह का ब्लैकहोल दिखता है। जहाँ से कुछ भी वापस नहीं लौटता।

देश की पहली सुसाइड हेल्पलाइन में काम करता था वो। सोचिए इतना बड़ा देश। फ़ोन कॉल्ज़ इंसान की जान के बाद सबसे सस्ती चीज़। दिन भर अनगिनत फ़ोन आते थे। उस कॉल सेंटर में उसके सिवा पच्चीस लोग और थे। सब पार्ट-टाइमर। कि सिर्फ़ ये काम करने से लोगों के अंदर आत्मघाती प्रवित्ति बनने लगती थी। जितने फ़ोन आते उसके बाद वे अक्सर फ़ॉलो अप कॉल भी करते थे। अपने जीवन की सारी पॉज़िटिव ऊर्जा झोंक देने के बाद भी वे सिर्फ़ ५० प्रतिशत लोगों को बचा पाते थे। उनके लाख कोशिश करने पर भी उन्हें वे कॉल्ज़ याद नहीं रहती थीं जिसमें व्यक्ति ने मरने के बारे में सोचना बंद कर दिया। लेकिन उनसे बात करने के बावजूद जो लोग अगले कुछ दिनों में जान दे देते थे, उसका बोझ उस हेल्पलाइन में काम करने वाला कोई भी व्यक्ति सम्हाल नहीं पाता था। नियमों के हिसाब से उनके रेग्युलर चेकअप हुआ करते थे। शारीरिक ही नहीं। मानसिक भी। उनके यहाँ आने वाले मनोचिकित्सक बहुत नर्म दिल और सख़्तजान हुआ करते थे।

आप तो जानते हैं कि देश का क़ानून आत्महत्या करने वाले को दोषी क़रार देता है। सारे धर्म भी।

लड़का उस हेल्पलाइन में कभी भी ऑफ़िस से कॉल नहीं लेता था। ये कॉल्ज़ प्राइवट रखने बहुत ज़रूरी थे इसलिए फोन कभी भी रेकर्ड नहीं होते थे। उसे वर्क फ्रौम होम पसंद था। उसने अपने पूरे घर को वाइफ़ाई से कनेक्ट कर रखा था। जब फ़ोन आता तो आवाज़ स्पीकर्स के रास्ते पूरे घर में सुनाई देती थी। वो पूरी तन्मयता से फ़ोन कॉल करने वाले की कहानी सुनता था। अपनी आवाज़ में मीठापन और दृढ़ता का बैलेन्स रखता था।

उसे दो चीज़ों से बहुत कोफ़्त होती थी। आत्महत्या करने की कोशिश करने के बाद अपने मंसूबे में असफल व्यक्तियों से और fencesitters। वे लोग जो अभी तक मन नहीं बना पाए थे कि वे ज़िंदगी से ज़्यादा प्यार करते हैं या मौत से। इस ऊँची दीवार पर बैठे हुए लोगों को काले गहरे अंधेरे में धक्का देना उसे बहुत दिलचस्प लगता था। इसको बात करने का नेगेटिव स्टाइल भी कहते हैं। इसका कई बार सही असर भी होता है। कोई कह रहा है कि मैं सूयसायड करना चाहता हूँ तो वो उसकी पूरी कहानी ध्यान से सुनता था और फिर उसे उकसाता था। कि ऐसी स्थिति में बिलकुल आत्महत्या कर ही लेनी चाहिए। वो अक्सर लोगों को कायर करके चिढ़ाता था। उन्हें उद्वेलित करता था। उनकी उदासी को और गहरा करता था। उन्हें ‘लूज़र’ जैसी गालियों से नवाजता था। उनकी कमज़ोरियों को उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल करता था। ऐसे अधिकतर लोग उससे बात करके आत्महत्या के लिए एकदम तैयार हो जाते थे। कई बार तो वे फ़ोन पर रहते हुए अपनी कलाई काट लेते थे या छत या पुल से छलाँग लगा देते थे। उसे ‘live’ मृत्यु को छूना एक अड्रेनलिन रश देता था। यही उसका नशा था। यही उसके जीवन का मक़सद।

पहली जिस चीज़ से उसे कोफ़्त होती थी वो इस बात से कि लोग इंटर्नेट और गूगल के ज़माने में इतने बेवक़ूफ़ कैसे रह जाते हैं। कलाई कैसे काटी जाती है। फंदा कैसे डाला जाता है। कितनी फ़ीट से कूदने पर जान चली जाने की गारंटी है। शहर में कौन कौन सी गगनचुंबी इमारतें हैं जिनके छत पर कोई सुरक्षा नहीं है। मेडिकल स्टोर से नींद की गोलियाँ ख़रीदने के लिए कितनी घूस देनी पड़ती है। हाइवे का कौन सा ख़तरनाक ब्लाइंड टर्न है जहाँ अचानक खड़े हो जाने पर ट्रक उन्हें कुचल देगा। कार्बन monoxide poisoning क्या होती है। वे कौन से स्टोर हैं जो ऐसे किसी व्यक्ति के संदिग्ध आचरण को पुलिस के पास रिपोर्ट नहीं करेंगे। कुछ भी काम करने के पहले तैय्यारी ज़रूरी है। ये निहायत बेवक़ूफ़ लोग जिन्हें ना जीने का सलीक़ा आता है ना मौत की फूल-प्रूफ़ प्लानिंग। इन लोगों की मदद करने में उसका इतना ख़ून खौलता था कि कभी कभी उसका जी करता था कि चाक़ू से गोद गोद कर इन्हें मार दे।

सूयसायड हेल्पलाइन के जितने कॉल्ज़ उसके पास जाते थे। उसमें से नब्बे प्रतिशत लोग ज़िंदा नहीं बचते थे। ये उसका टैलेंट था। वो अपने आप को vigilante समझता था। मृत्यु का रक्षक। उसके हिस्से के इंसान उसके पास भेजने का कांट्रैक्ट धारी। अंधेरे में काम करता था। अपनी पहचान सब से छुपाता था। लेकिन मुझसे नहीं। उसका कहना था धरती पर उन सब लोगों की जगह है जो यहाँ रहना चाहते हैं। जिन्हें नर्क जाने की हड़बड़ी है तो हम कौन होते हैं उनका रास्ता रोकने वाले। उसे वे सारे लोग ज़बानी याद थे जो उसे फ़ोन करते थे। उनके फ़ोन नम्बर। उनके घर। उनके पसंद के कपड़े। वो उनका सबसे अच्छा दुश्मन हुआ करता था।

कल ही रात को मैंने फ़ोन किया था उसे। उसने मुझे दवा का नाम भी बताया और मेडिकल स्टोर का भी। स्लीपिंग पिल्ज़। आपको मालूम है कि स्लीपिंग पिल्ज़ को पीने के पहले पानी में घोलना पड़ता है? अगर आप यूँ ही उन्हें निगल गए तो आपका शरीर उल्टियाँ कर कर के सारी दवाई बाहर फेंक देगा।

मगर आपने तो कभी आत्महत्या के बारे में सोचा ही नहीं होगा। मुझे वे लोग समझ नहीं आते जिन्होंने कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचा। रेज़र ब्लेड से ऊँगली के नाख़ून काटते हुए जिन्हें नीली नसों में दौड़ते ख़ून को बहते देखने का चस्का नहीं लगा कभी। जो पहाड़ों की चोटी से नीचे कूदने का सपना मुट्ठी में बंद करके नहीं सोते।

मेरे ख़त में आख़िरी दुआ उन सब लोगों के नाम जिन्होंने कभी मृत्युगंध को पर्फ़्यूम की तरह अपनी कलाई पर नहीं रगड़ा है। ईश्वर आपकी आँखों का उजाला सलामत रखे। 

21 May, 2017

राइटर की डायरी में लिखा आधा चैप्टर इश्क़



आज कुछ लिखना चाहती हूँ। बिना एडिट किए हुए। कि शायद रात का वक़्त है। ज़िंदगी का, अकेलेपन का, उदासी का और चुप्पी का मिलाजुला कोई नशा चढ़ा हुआ है ज़ुबान पर। उँगलियाँ सच लिख देना चाहती हैं। मगर इन दिनों बहुत ज़्यादा ही उलझनें हैं...दिमाग़ एक साथ कई सारे ट्रैक पर काम कर रहा है और असल में कन्फ़्यूज़ हो रहा है। इसलिए नौर्मल, भले इंसानों से गुज़ारिश है कि इसे स्किप कर दें और अपने क़ीमती वक़्त का बेहतर इस्तेमाल करें।

मुझे क्रिकेट की ज़रा भी समझ नहीं है। लेकिन शब्दों से हमेशा प्यार रहा है इसलिए किसी नए शब्द से पाला पड़ा तो उसे समझने की कोशिश की है। किसी नए अहसास से पाला पड़ा हो तब भी। एक गाना आया था बहुत साल पहले, 'आने चार आने बचे हैं चार आने, सुन ले वेस्ट ना करना यार', इसमें बूढ़े रिटायर्ड लोग अपने ज़िंदगी की सेकंड इनिंज़ को फ़्रंट फ़ुट पर खेलना चाहते हैं। कुछ तो उस समय और कुछ पहले का थोड़ा बहुत अन्दाज़। बैक फ़ुट पर खेलना क्या होता है, ठीक ठीक समझ आया। 

फिर लगा कि ज़िंदगी हमेशा बैक फ़ुट पर खेलते आए हैं। हम जिस समझ में पले-बढ़े हैं उसमें लड़कियों को हमेशा डिफ़ेन्सिव होना सिखा दिया जाता है। कहीं से किसी भी तरह का कोई इल्ज़ाम छू ना ले हमें। हम हमेशा एक कारण, एक वजह तैयार रखते हैं, हर चीज़ की। चाहिए वो किसी से बात करना हो, ज़रा सा ज़्यादा सजना हो, कुछ अच्छे कपड़े पहनने हों, कुछ भी। लड़कपन से ही शृंगार को ग़लत कहा जाता गया है और मेक-अप करने वाली लड़कियों को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता। इस बात का असर अभी तक भी यूँ है कि मैं सिर्फ़ शादी या फ़ंक्शन में लिप्स्टिक लगाती हूँ। ख़ूबसूरत दिखना गुनाह होता है। अपनी ख़ूबसूरती को ऐक्सेप्ट करना नहीं सिखाया गया हमें। अपनी ख़ूबसूरती के साथ आने वाले साइड-एफेक्ट्स को भी नहीं। मसलन, सबको तुमसे प्यार हो जाएगा। सबको ही। 

मगर दुनिया और समाज के अलावा भी घर के संस्कार होते हैं परवरिश होती है जिसमें बाक़ी हर तरह की बराबरी होती है। पढ़ना लिखना, लोगों से बात करना, किसी भी जगह जाना या कि अपने पसंद का कैरियर चुनना ही। मैंने कई लड़कों से सुना है कि लड़कियाँ इंटेलीजेंट नहीं होतीं, या कि मैं बाक़ी लड़कियों की तरह नहीं हूँ। एक समय में मैं इसे कॉम्प्लिमेंट की तरह लेती थी। लेकिन लड़ती तब भी थी। अब देखो, बात सीधी सी ये है कि लड़कियों को बचपन से ही बहुत ज़्यादा लोगों से मिलने जुलने के अवसर नहीं मिलते हैं। वे अपने स्कूल कॉलेज या घर पर जो फ़ैमिली फ़्रेंड्स होते हैं, उनके सिवा किसी से नहीं मिलतीं। अक्सर बाहर का कोई काम नहीं करतीं। अब यहाँ इकलौता अंतर आ सकता है तो इस चीज़ से आता है कि लड़कियों के पास किताबें किस तरह की पहुँच रही हैं। उन्हें इक्स्पोज़र किस तरह का मिला है। वे किन किन चीज़ों से नहीं डरती हैं। वे किन चीज़ों के सही ग़लत को परखने का पैमाना ख़ुद बनाना चाह रही हैं।
मैं आज भी पटना वीमेंस कॉलेज की मेरी उन क्लास्मेट्स को 'awe', एक विस्मय से देखती हूँ कि जो बोरिंग रोड के उन शेडी साइबर कैफ़े में न्यूड फ़ोटो देखने की हिम्मत रखती थीं। ये तब की बात है जब हमें ब्राउज़र हिस्ट्री भी डिलीट करनी नहीं आती थी। हम जब उन छोटे छोटे क्यूबिकल्ज़ से निकलते थे तो हम भी जानते थे कि हमें कैसी नज़रों से घूरा जा रहा है। उन दिनों क्रांति इतनी छोटी छोटी हुआ करती थी कि महीने में एक बार साइबर कैफ़े जा कर बॉयफ़्रेंड को एक ईमेल कर दी। कि ईमेल कोई चिट्ठी तो है नहीं कि सबूत है कि हमने ही लिखा है, ईमेल तो कोई भी लिख सकता है। हम अपने हर काम के साथ बहाने साथ में तैयार रखते थे। समाज ने हमें हर क़दम पर झूठ बोलना सिखाया है। अफ़सोस इस बात का है कि इन छोटी छोटी चीज़ों पर झूठ बोलने की ज़रूरत पड़ी ही क्यूँ।
बहुत लम्बी नहीं लिखूँगी कहानी, लेकिन बात ये है कि उम्र इतनी हो आयी। शादी के इतने साल हो आए। और लिखते पढ़ते हुए एक दशक बीत गया लेकिन अभी भी किसी पाठक या फ़ैन से बात करते हुए हमेशा इस बात का ध्यान रखना होता है कि वो लड़की है या लड़का। लड़कियों से बात करने के अलग सिंटैक्स होते हैं और लड़कों से बात करने के अलग। ये बात उनकी उम्र से परे होती है। कोई लड़की अगर कह जाए कि आपकी किताब पढ़ के आप से प्यार हो गया तो फिर भी ठीक है, उसके बचपने और प्यार पर मुस्कुरा सकती हूँ, लेकिन यही बात अगर किसी लड़के ने कह दी तो उसको उसी समय डांट फटकार लगानी ज़रूरी हो जाती है कि वरना वो आगे जाने क्या सोच लेगा। किसी से भी बात करते हुए एक ज़रा सी रूखाइ बनाए रखनी होती है कि किसी को ये धोखा ना हो जाए कि मैं उसके लिए कोई भी सॉफ़्ट कॉर्नर या ऐसी ही कोई भावना रखती हूँ। चूँकि मैं इस अंतर और बेइमानी में भरोसा नहीं करती हूँ तो अक्सर लड़कियाँ भी ज़्यादा प्यार मुहब्बत जता रही होती हैं पब्लिक में तो असहज हो जाती हूँ। दरसल, मैं प्यार से ही असहज हो जाती हूँ। जब तक प्यार क़िस्से कहानियों में है तो ठीक, लेकिन जैसे ही कहानी से निकल कर मेरी कंगुरिया ऊँगली पकड़ना चाहता है, या कि दुपट्टे का छोर ही, हम बिलकुल ही दूर आ जाते हैं उससे।

मैं कहना चाहती हूँ कि इससे कितना नुक़सान होता है। आप किसी के प्रति अपने स्नेह को छिपाते हैं। अपना अनुराग प्रदर्शित करने से डरते हैं। अपनी श्रद्धा अभिव्यक्त नहीं करते। कितना सारा कुछ अपने अंदर रख के जीना होता है। ये बेइमानी नहीं है? अंदर रखे हुए ये सारे शब्द कितनी तकलीफ़ देते हैं। हम इस डर के मारे कितना कुछ खो देते हैं। जो एक लड़का बड़ी तमीज़ से हमेशा बातें करता है, जिसको हम थोड़ा दुलार में कभी सर चढ़ाना चाहते हैं। हम जिससे ख़ूब सारी बातें करना चाहते हैं। उसके शहर के बारे में, उस लड़की के बारे में जिसका ज़िक्र उसकी कविताओं में छिपा होता है। हम पूछना चाहते हैं कि वो कौन थी जिसने तुम्हारा दिल इस तरह तोड़ा कि तुम ऐसा मारक लिखते हो। लेकिन हम डरते हैं। डरते हैं कि ज़्यादा पर्सनल ना हो जाएँ। दोस्ती ज़्यादा गहरी ना हो जाए। या कि वो फ़ैन जो दिल्ली में पुस्तक मेले में मिला था, बड़ी गर्मजोशी से बुलेट के बारे में बात करता था...बचपना था उसमें बहुत...उससे उसके जेनेरेशन के लोगों की बातें करना चाहती हूँ। मैं जानना चाहती थी कि पढ़ाई लिखाई, लड़कीबाज़ी और नौकरी के सिवा वे क्या करते हैं, क्या करना चाहते हैं। मैं सिर्फ़ साल में एक बार इन लोगों से बात नहीं करना चाहती। मैं इनसे जुड़े रहना चाहती हूँ बाक़ी वक़्त भी। कि मुझे अच्छे लगते हैं बच्चे जो किताबें पढ़ते हैं। किताबें पढ़ना चाहते हैं। मुझसे पूछते हैं कि हम किस किताब से शुरू करें।

हम असल में, हमेशा इस बात से डरते हैं कि किसी को हमसे प्यार ना हो जाए। लेकिन क्यूँ। ये क्यूँ मुझे कभी समझ नहीं आता। हम इस ख़तरे से डरना कब बंद करेंगे? क्या ही हो जाएगा...थोड़ा दिल ही दुखेगा ना...थोड़ा नींद हराम होगी...थोड़ा विस्की या कि ओल्ड मौंक की बिक्री बढ़ेगी। यही ना? बाक़ी हमको सिर्फ़ बात करने को वो लोग चाहिए जिन्हें मेरी जैसी चीज़ें पसंद हों। सिनेमा। गाने। कोई आर्टिस्ट। माडर्न आर्ट। पेंटिंग्स। रॉयल एनफ़ील्ड। हार्ले देविडसन। बंजारामिज़ाजी। शहर दिल्ली। मौसम। आवारगी। कर्ट कोबेन। आत्महंता होना। नाज़ी कॉन्सेंट्रेशन कैम्प।

हमें इश्क़ को सम्हालना सीखना है। कि कोई आ के कहे कि इश्क़ हो गया तुमसे तो उसे बिठा कर ठीक से समझा सकूँ, ज़िंदगी में ऐसे छोटे मोटे हादसे होते रहते हैं। ये बताओ, कविता पढ़ोगे या कहानी। चाय पियोगी या कॉफ़ी। है कि नहीं। अब चलो, बातें करते हैं...ब्लैक कॉफ़ी पीते हुए। तुम अपने पसंद के गाने भेजो, मैं अपने पसंद की कविताएँ। हम इसी तरह सीखते हैं। हम इसी तरह ज़िंदगी में अलग अलग रंग भरते हैं।

और हम, इस तरह, ज़िंदगी भर बैक फ़ुट पर खेलते रहे। इश्क़ की बाउन्सर से आउट होते रहे। हेल्मट और अच्छी जैकेट पहन कर बाइक चलाते रहे। लेकिन इन दिनों हम थोड़ा थोड़ा जी रहे हैं। ख़ुद से इश्क़ कर रहे हैं थोड़ा थोड़ा। इस बात से बेपरवाह कि किसी को हमसे इश्क़ हो जाएगा, मेरी बला से! बाल खोल कर घूम लेते हैं। गहरी गुलाबी लिप्स्टिक लगा लेते हैं। कि ये मेरी ज़िंदगी है और अब जितनी बची है, मैं अपने हिसाब से जियूँगी। मैनेज कर लेंगे इश्क़ भी, आफ़त भी और लिखना भी।

02 March, 2017

मेरा अंतिम अरण्य, तुम्हारे दिल में बनी वो क़ब्र है, जिसमें मेरी चिट्ठियाँ दफ़्न हैं


१७ जनवरी २०१७
"जिंद?" मैंने उनकी ओर देखा।
'जिन्दल' उन्होंने कहा, नक़्शे में 'एल' दिखायी नहीं देता। वह दरिया में डूब गया है।"
मैंने भी जिन्दल का नाम नहीं सुना था...नक़्शे में भी पहली बार देखा...जहाँ सचमुच दरिया की नीली रेखा बह रही थी...
- निर्मल वर्मा। अंतिम अरण्य
***
इस शहर में रहते हुए कितने शहरों की याद आती है। वे शहर जो क़िस्सों से उठ कर चले आए हैं ज़िंदगी में। वे शहर जिनका नाम पहली बार पढ़ कर लगता है मैंने उस शहर में किसी को कोई ख़त लिखा था कभी। 
सुनो। तुम्हें नीलम वादी याद है क्या अब भी? नाम क्या था उस नदी का जो वहाँ बहती थी? 
तुम्हें याद है क्या वो वक़्त जब कि दोस्ती बहुत गहरी थी...हम काग़ज़ की नाव तैराया करते थे पानी में। लिखा करते थे ख़त। काढ़ा करते थे तुम्हारा नाम रूमालों में। 
तुम अजीब क़िस्म से याद आए हो। अचानक से तुम्हें देखने को आँख लरज़ उठी है।

१९ जनवरी २०१९
उम्र के तैन्तीसवे पड़ाव के ठीक बीच झूलती मैं अंतिम अरण्य पढ़ती हूँ...नितांत अकेलेपन के अंदर खुलने वाले इस उपन्यास को पढ़ने के लिए किसी ने मुझसे क्यूँ कहा होगा! मैं क्यूँ इसे पढ़ते हुए उसके अकेलेपन के क़रीब पाती हूँ ख़ुद को। क्या कभी कभी किसी का साथ माँग लेना इतना मुश्किल होता है कि बात को बहुत घुमा कर किसी नॉवल में छिपाना होता है। 
'I thought you wanted to say something to me.' उसने कहा मुझसे मगर मुझे क्यूँ लगा वो ख़ुद की बात कर रहा है। उसे मुझसे कोई बात कहनी थी। बात। कौन सी बात। दो लोग कौन सी बात कहते हैं, कह लेते हैं। मेले के शोर और भगदड़ में एक कॉफ़ी भर की फ़ुर्सत में क्या कहा जा सकता है।
मैं उससे कहती हूँ, 'I miss writing to you'। जबकि कहीं मुझे मालूम है कि उसे लिखे ख़त किन्हीं और ख़तों का echo मात्र हैं। मैं जी नहीं रही, एक परछाई भर है मेरे बदन की जो अंधेरे में मुस्कुराती है...उदास होती है।
कोई सफ़र है...मेरे अंदर चलायमान...कोई शहर...मेरे अंदर गुमशुदा. बस इतना है कि शायद अगली कोई कहानी लिखने के पहले बहुत सी कहानियों को पढ़ना होगा...उनसे पनाह माँगनी होगी...
सुनो। क्या तुम मेरे लिए एक चिट्ठी लिख सकते हो? काग़ज़ पर। क़लम से। इस किताब को पढ़ते हुए मैं एक जंगल होती गयी हूँ। इस जंगल के एक पेड़ पर एक चिट्ठीबक्सा ठुका हुआ है। ख़ाली।
मैं इंतज़ार में हूँ। 



२१ जनवरी २०१७
हम क्या सकेरते हैं। कैसे।
अंतिम अरण्य को पढ़ते हुए मैं अपने भीतर के एकांत से मिलती हूँ। क्या हम सब के भीतर एक अंतिम अरण्य होता है? या फिर ये किताब मुझे इसलिए इतना ज़्यादा अफ़ेक्ट करती है कि मैं भी महसूस करती हूँ कि मैं इस जंगल में कुछ ज़्यादा जल्दी आ गयी हूँ। इस उम्र में मुझे किसी और मौसमों वाले भागते शहर में होना चाहिए। धूप और समंदर वाले शहर। 
मगर प्रेम रेत के बीच भूले से रखा हुआ ओएसिस है। मृगतृष्णा भी। 
मैं अपने एक बहुत प्यारे मित्र के बारे में एक रोज़ सोच रही थी, 'तुम में ज़िंदा चीज़ों को उगाने का हुनर है...you are a gardener.' और वहीं कहीं कांट्रैस्ट में ख़ुद को देखती हूँ कि मुझे मुर्दा चीज़ें सकेरने का शौक़ है...हुनर है...मृत लोग...बीते हुए रिश्ते...किरदार...शहर...टूटे हुए दिल...ज़ख़्म...मैं किसी म्यूज़ीयम की कीपर जैसी हूँ...जीवाश्मों की ख़ूबसूरती में मायने तलाशती...अपने आसपास के लोगों और घटनाओं के प्रति उदासीन. Passive. 
किसी किसी को पढ़ना एक ज़रूरी सफ़र होता है। निर्मल वर्मा मेरे बहुत से दोस्तों को पसंद हैं। मैंने पिछले साल उनके यात्रा वृत्तांत पढ़े। वे ठीक थे मगर मेरे अंदर वो तकलीफ़/सुख नहीं जगा पाए जिसके लिए मैं अपना वक़्त किताबों के नाम लिखती हूँ। मैंने लगभग सोच लिया था कि अब उन्हें नहीं पढ़ूँगी। वे मेरी पसंद के नहीं हैं। मैं बहुत याद करने की कोशिश करती हूँ कि अंतिम अरण्य की कौन सी बात को सुन कर मैंने इसे तलाशा। शायद ये बात कि ज़िंदगी के आख़िर का सघनतम आलेख है। या उदासी की आख़िरी पंक्ति। पहाड़ों पर इतनी तन्हाई रहती है उससे गुज़रने की ख़्वाहिश। या कि अपने अंतिम अरण्य को जाने वाली पगडंडी की शुरुआत देखना। आज जानती हूँ कि वे सारे मित्र जिन्होंने बार बार निर्मल को पढ़ा...उनके बारे में बातें कीं...वे इसलिए कि मैं इस किताब तक पहुँच सकूँ। पूछो साल की वो किताबें एक ज़रूरी पड़ाव थीं...मेरे सफ़र को इस 'अंतिम अरण्य' तक रुकना था। के ये मेरी किताब है। मेरी अपनी। 
सुबहें बेचैन, उदास और तन्हा होती हैं। आज पढ़ते हुए देखा कि एक पगडंडी बारिश के पानी में खो रही थी। नीली स्याही से underline कर के मैंने उसके होने को ज़रा सा सहेजा। ज़रा सा पक्का किया। 
सुनो। तुम्हारे किसी ख़त में मेरा अंतिम अरण्य है। मेरी चुप्पी।मेरी अंतिम साँस। मेरे जीते जी मुझे एक बार लिखोगे?


२ मार्च २०१७
धूप की आख़िर सुबह अगर किताब के आख़िरी पन्ने से गुज़र कर चुप हो आने का मन करे...तो इसका मतलब उस किताब ने आपको पूरा पढ़ लिया है। हर पन्ने को खोल कर। अधूरा छोड़ कर। वापस लौट कर भी। 

मैं अंतिम अरण्य से गुज़रती हुयी ख़ुद को कितना पाती हूँ उस शहर में। मेरा भी एक ऐसा शहर है जिसे मैं मकान दर मकान उजाड़ रही हूँ कि मेरे आख़िर दिनों में मुझे कोई चाह परेशान ना करे। कि मैं शांत चित्त से जा सकूँ। इस किताब को पढ़ना मृत्यु को बहुत क़रीब से देखना है। किसी को कण कण धुआँ हो जाते देखना भी है। 

अनजाने इस किताब में कई सारे पड़ाव ऐसे थे जिन पर मुझे रुकने की ज़रूरत थी। कहानी में एक कहानी है एक डाकिये की निर्मल लिखते हैं कि उस शहर में एक डाकिया ऐसा था कि जो डाकखाने से चिट्ठियाँ उठाता तो था लेकिन एक घाटी में फेंक आता था। वैली औफ़ डेड लेटर्स। इस किरदार के बारे में भी किरदार को एक दूसरा किरदार बताता है। वो किरदार जो मर चुका है। तो क्या कहीं वाक़ई में ऐसा कोई डाकिया है? 

कोई मुझे ख़त लिख सके, ये इजाज़त मैंने बहुत कम लोगों को दी है। जब कि चाहा हर सिम्त है कि ख़त आए। बहुत साल पहले एक मेल किया था किसी को तो उसने जवाब में एक पंक्ति लिखी थी, ‘अपने मन मुताबिक़ जवाब देने का अधिकार कितने लोगों के पास होता है’। यूँ तो उसका लिखा बहुत सारा कुछ ही मुझे ज़बानी याद है मगर उस सब में भी ये पंक्ति कई बार मेरा हाथ सहलाती रही है। बैंगलोर आयी थी तो बहुत शौक़ से लेटर ओपनर ख़रीदा था। मुझे लगता रहा है हमेशा कि मेरे हिस्से के ख़त आएँगे। अब लगता है कि कुछ लोगों का दिल एक लालडिब्बा हुआ गया है कि जिसमें मेरे हिस्से की मोहरबंद चिट्ठियाँ गिरी हुयी हैं। बेतरतीब। जब वे चिट्ठियाँ मुझे मिलेंगी तो मैं सिलसिलेवार नहीं पढ़ पाऊँगी उन्हें। हज़ार ख़यालों में उलझते हुए बढ़ूँगी आगे कि किसी के हिस्से का कितना प्रेम हम अपने सीने में रख सकते हैं। अपनी कहानियों में लिख सकते हैं। 

अंतिम अरण्य मैंने दो हिस्सों में पढ़ा। पहली बार पढ़ते हुए यूँ लगा था जैसे कुछ सील रहा है अंदर और इस सीलेपन में कोई सरेस पेपर से छीजते जा रहा है मुझे। कोई मेरे तीखे सिरों को घिसता जा रहा है। लोहे पर नए पेंट की कोट चढ़ाने के पहले उसकी घिसाई करनी होती है। सरेस पेपर से। पुरानी गंदगी। तेल। मिट्टी। सब हटाना होता है। ऐसे ही लग रहा है कि मैं एकदम रगड़ कर साफ़ कर दी गयी हूँ। अब मुझ पर नया रंग चढ़ सकता है। 

कितनी इत्मीनान की किताब है ये। कैसे ठहरे हुए किरदार। शहर। अंदर बाहर करते हुए ये कैसे लोक हैं कि जाने पहचाने से लगते हैं। मैं फिर कहती हूँ कि मुझे लगता है मैंने अपना अंतिम अरण्य बनाना शुरू कर दिया है। आज की सुबह में किताब का आख़िर हिस्सा पढ़ना शुरू किया। धूप सुहानी थी जब पन्नों ने आँखें ढकी थीं। अब धूप का जो टुकड़ा खुले काँधे पर गिर रहा है उसमें बहुत तीखापन है। चुभन है। 

किसी हिस्से को उद्धृत करने के लिए पन्ने पलटाती हूँ तो देखती हूँ पहले के पढ़े हुए कुछ पन्नों में मैंने अपनी चमकीली फ़ीरोज़ी स्याही से कुछ पंक्तियाँ अंडरलाइन कर रखी हैं। मुझे ये बात बहुत बुरी लगती है। मृत्यु की इस पगडंडी पर चलते हुए इतने चमकीले रंग अच्छे नहीं लगते। वे मृतक के प्रति एक ठंढी अवहेलना दिखाते हैं। ये सही नहीं है। मुझे पेंसिल का इस्तेमाल करना चाहिए था। मैं रंगों को ऐसे तो नहीं बरतती। अनजाने तो मुझ से कुछ नहीं होता। गुनाह भी नहीं। 

पढ़ते हुए अनजाने में बहुत लेखा जोखा किया। बहुत शहरों से गुज़री। कुछ लोगों से भी। इन दिनों जो दूसरी किताब पढ़ रही हूँ वो भी ऐसी ही कुछ है। नीला घर- तेज़ी ग्रोवर। त्रांस्टोमेर के एक द्वीप पर बने घर में वह जाती है और उनके सिर्फ़ दो शब्दों से और घर के इर्द गिर्द जीती हुयी चीज़ों से कविताओं में बची ख़ाली जगह भरती है। 

उनका कहा हुआ आख़िरी शब्द होता है, ‘थैंक्स’ इसके बाद वे कुछ भी कह नहीं पाते। मृत्यु के पहले वो अपनी कृतज्ञता जता पाते हैं। मुझे ये एक शब्द बहुत कचोटता है। उनके साथ रहने वाले नौकर ने उनकी दर्द में तड़पती हुयी पत्नी के लिए जल्दी मर जाने की दुआएँ माँगी थीं। वे पूछते हैं, मेरे लिए तुमने कभी मन्नत माँगी? नौकर जवाब देता है, आपके पास तो सब कुछ है। आपके लिए क्या मांगूँ। कोई हो मेरे लिए मन्नत कर धागा बाँधने वाला तो मेरे लिए तुम्हारी एक चिट्ठी माँग दे। सिर्फ़ एक। काग़ज़ पर लिखी हुयी। तुम्हारी उँगिलयों की थरथराहट को समेटे हुए। तुम्हारे जीने, तुम्हारे साँस लेने और तुम्हारे ख़याल में किसी एक लम्हा धूमकेतू की तरह चमके मेरे ख़याल को भी। 

आख़िर में बस एक छोटा सा पैराग्राफ़ यहाँ ख़ुद के लिए रख रही हूँ। किसी चीज़ की असली जगह कहाँ होती है। मैं जो बेहद बेचैन हुआ करती हूँ। एक जगह थिर बैठ नहीं सकती। आज अचानक लगा है। तुम बिछड़ गए हो इक उम्र भर के लिए। मेरे लिए आख़िर, सुकून की जगह, तुम्हारे दिल में बनी वो क़ब्र है जिसमें मेरी चिट्ठियाँ दफ़्न हैं। 

***
2.4

कोर्बेट के मेमोयर का हिस्सा ‘मेरी आहट सुनते ही सारा जंगल छिप जाता था’ — वह लिखते हैं — और मुझे लगता था जैसे…”, वह एक क्षण को रुके, जैसे किसी फाँस को अपने पुराने घाव से बाहर निकाल रहे हों, “जैसे मैं किसी ऐसी जगह आ गया हूँ जो मेरी नहीं है।”
वह कुछ देर इसकी ओर आँखें टिकाए लेटे रहे। फिर कुछ सोचते हुए कहा, “हो सकता है — हमारी असली जगह कहीं और हो और हम ग़लती से यहाँ चले आएँ हों?” उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि मैं हकबका सा गया।
“कौन सी असली जगह?” मैंने कहा, “इस दुनिया के अलावा कोई और जगह है?”
“मुझे नहीं मालूम, लेकिन जहाँ पर तुम हो, मैं हूँ, निरंजन बाबू हैं, ज़रा सोचो, क्या हम सही जगह पर हैं? निरंजन बाबू ने एक बार मुझे बड़ी अजीब घटना सुनायी…तुम जानते हो, उन्होंने फ़िलोसफ़ी तो छोड़ दी, लेकिन साधु-सन्यासियों से मिलने की धुन सवार हो गयी…जो भी मिलता, उससे बात करने बैठ जाते! एक बार उन्हें पता चला की कोई बूढ़ा बौद्ध भिक्षुक उनके बग़ीचे के पास ही एक झोंपड़ी में ठहरा है…वह उनसे मिलने गए, तो भिक्षुक ने बहुत देर तक उनके प्रश्नों का कोई जवाब नहीं दिया…फिर भी जब निरंजन बाबू ने उन्हें नहीं छोड़ा, तो उन्होंने कहा — पहले इस कोठरी में जहाँ तुम्हारी जगह है, वहाँ जाकर बैठो…निरंजन बाबू को इसमें कोई कठिनाई नहीं दीखी। वह चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ गए। लेकिन कुछ ही देर बाद उन्हें बेचैनी महसूस होने लगी। वह उस जगह से उठ कर दूसरी जगह जाकर बैठ गए, लेकिन कुछ देर बाद उन्हें लगा, वहाँ भी कुछ ग़लत है और वह उठ कर तीसरी जगह जा बैठे…उनकी बेचनी बढ़ती रही और वह बराबर एक जगह से दूसरी जगह बदलते रहे…फिर उन्हें लगा जैसे एक ही जगह उनके लिए बची थी, जिसे उन्होंने पहले नहीं देखा था, दरवाज़े की देहरी के पास, जहाँ पहले अँधेरा था और अब हल्की धूप का चकत्ता चमक रहा था…वहाँ बैठते ही उन्हें लगा, जैसे सिर्फ़ कुछ देर के लिए — कि यह जगह सिर्फ़ उनके लिए थी, जिसे वह अब तक खोज रहे थे…जानते हो — वहाँ बैठ कर उन्हें क्या लगा…एक अजीब-सी शांति का बोध — उन्हें लगा उन्हें भिक्षुक से कुछ भी नहीं पूछना, उन्हें सब उत्तर मिल गए हैं, मन की सारी शंकाएँ दूर हो गयी हैं — वह जैसे कोठरी में आए थे, वैसे ही बाहर निकल आए…”

— अंतिम अरण्य 

17 February, 2017

तुमने नमक सिर्फ़ कविताओं में चखा है


‘सिगरेट’… ‘एक सिगरेट मिलेगी?’ इस अजनबी शहर में जितनी बार सोचा है कि माँग लूँ किसी से अपने क़त्ल का सामान। लेकिन ये अजीब शहर है कि यहाँ कोई अजनबियों का क़त्ल नहीं करता। सिगरेट देने के पहले वे चूमना चाहते हैं मेरे होंठ। वे अँधेरा बुलाना चाहते है कि सिगरेट जलाते हुए देख सकें मेरी आँखें। मैंने तुम्हारे नाम के रेशम दस्ताने पहने हुए हैं कि कोई छू ना सके तुम्हारा नाम। कि कोई लिख ना दे तुम्हारे नाम से कविता कोई। मगर वे एक सिगरेट के बदले माँगते हैं मुझसे मेरे बाएँ हाथ का नीला दस्ताना। तुम्हें याद है पिछली सर्दियों में तुमने दिलवाए थे नीले दस्ताने? धुएँ ने वादा किया है कि वो मेरे इर्द गिर्द बहते समय को रोक कर रखेगा कि एक सिगरेट की ही तो बात है।

मैंने उसकी शक्ल नहीं देखी। सिर्फ़ लाइटर देखा है उसका। मगर उसने धोखे से पकड़ कर मेरा हाथ चूम ली है मेरी हथेली। सहम गयी है बेफ़िक्र मुस्कुराती हार्ट लाइन। हार्ट लाइन। तुमसे पहली बार मिली थी तो वो पहली चाँद की रात थी। मैंने लजा कर दोनों हथेलियों में ढक लिया था चेहरा…हौले से खोल कर हथेलियाँ, ठीक बीच से तोड़ा था चाँद और इसी हार्ट लाइन के पार तुम्हें पहली बार देखा था। उस अजनबी को कुछ भी नहीं मालूम। उसने इश्क़ नहीं जाना है, वो सिर्फ़ ज़िद जानता है। नियम जानता है। और इस शहर के नियम कहते हैं किसी अजनबी को सिगरेट नहीं दे सकते हैं। उसने मुझे अपने प्रेमिका कह कर पुकारने के लिए ही ऐसा किया है। हार्ट लाइन ग़ुस्से में फुफकार उठी है और कोड़े की तरह बरस गयी है उसके होठों पर। मुझे बेआवाज़ सिर्फ़ दिल तोड़ना ही नहीं, थप्पड़ मारना भी आता है। आज मालूम चला है।

तुम्हारा नाम जिरहबख़्तर है। मैं आशिक़ों के शहर जाते हुए आँखों में तुम्हारे नाम का पानी लिए चलती हूँ। नमक से चीज़ों में जल्दी जंग लग जाती है, इस डर से कोई मेरी खारी आँखें नहीं चूमता। 

तुम्हारा स्पर्श एक मौसम है। बदन में खिलता हुआ। टहकता हुआ। गहरा लाल। सुर्ख़ नीला। काई हरा। जिन्होंने नहीं छुआ है तुम्हें वे बर्बाद हो जाने वाले इस मौसम से अनजान हैं। 

उनके लिए ये शहर वसंत है। कि जिसने बौराने की इजाज़त पुराने आम के पेड़ से ली है जिसमें इस साल मंज़र नहीं आएँगे। सड़कें मेरे नंगे पैरों के नीचे काले कोलतार के अंगारे बिछाते जाती हैं। इस पूरी दुनिया के सड़कों की लम्बाई बढ़ती जाती है जब भी कभी इश्क़ होता है मुझे। इक तुम्हारे पुकारने से बनने लगते हैं क़िस्से वाले शहर। कविताओं की बावलियाँ कि जिनमें प्यास छलछलाया करती है। उफ़। तुमने मेरा नाम लिया था क्या?

इस यूनिवर्स के expand करने की conspiracy थ्योरी सुनोगे? ऐसा इसलिए है कि तुम्हारा शहर मेरे दिल से दूर होता जाए। गुरुत्वाकर्षण फ़ोर्स जानते हो क्या होता है? इश्क़। जो सारी चीज़ों को आपस में बाँध के रखता है। किसी ऐटम का वजूद ही नहीं होता…इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन और neutron तक अलग अलग होते रहते। 

कि जानां, दुनिया की सबसे छोटी इकाई जानते हो क्या है? हिज्र। हम जब मिले थे और अगली बार जब मिलेंगे ये तुमसे मिलने के पलक झपकाते महसूस होने लगता है। इक साँस और दूसरी साँस के बीच खिंचती खाई है हिज्र। 

मगर मुझे थोड़ा बौराने की इजाज़त दो। इस शहर, इस मौसम और बिना सिगरेट की इस शाम की ख़ातिर। हम और तुम आख़िर अलग अलग शहरों में हैं। इश्क़ और पागलपन में इक शहर भर का अंतर है। तुम मेरे शहर में होते तो इश्क़ ने तबाही के शेड में रंग दिए होते मेरे कमरे के सारे काग़ज़। फिर मैं तुम्हें कैसे लिखती ख़त। कैसे। बिना ख़त के कैसे आते तुम मुझसे मिलने? कभी होता कि चाँद रात अपनी छत पर खड़े होकर तुमने देखा हो ध्रुवतारे को, ये जानते हुए कि मैंने तुम्हें बेतरह याद किया है? याद ऐसी नहीं कि लिख लूँ खत और एक शाम जीने की, साँस लेने की मोहलत मिल जाए। याद ऐसी कि जैसे माँगी जाती है दुआ, मैं घुटनों के बल बैठूँ। धुली हुयी गहरी गुलाबी साड़ी में। कानों में झूलते हो गुलाबी ही झुमके कि जिनमें लगे हों तुम्हारे शहर की नदी से निकाले गए क़ीमती पत्थर। सर पर आँचल खींचूँ। दोनों हथेलियों को जोड़ूँ साथ में और चाँद को बंद कर दूँ एक दुआ में। 

जानां। मैं मर जाऊँगी। मुझसे मिलने मेरे शहर आ जाओ।

तुम्हें समंदर का स्वाद नहीं मालूम। तुमने नमक सिर्फ़ कविताओं में चखा है। या कि तीखी सब्ज़ियों में। हज़ार मसालों के साथ जानते हो तुम नमक। कभी ऐसे शहर में गए हो जहाँ आँसुओं की बारिश होती है? अपनी हथेली चूमते हुए महसूसा है नमक को?कई साल तक उँगलियों के पोर में आँसू जज़्ब होते हैं तो उँगलियाँ नमक की बन जाती हैं। तुम क्यूँ चूमना चाहते हो मेरी उँगलियाँ? तुम्हें किसी ने कहा कि तुम्हारे लब खारे हैं? किसी ने चूमा है तुम्हें यूँ कि ख़ून का स्वाद और तुम्हारे होठों का स्वाद एक जैसा लगे?

मैं सिर्फ़ पागल हो रही होती तो कभी नहीं कहती तुमसे। मगर मेरी जान। मैं मर रही हूँ। 

सुनो जानां, आते हुए सिगरेट लेते आना।

16 February, 2017

बिसरता स्पर्श २ - मुहब्बत और टच मी नॉट

ज़िंदगी को बहुत गहराई से महसूसती हूँ। मेरे लिखने में और मेरे होने में चीज़ों की गंध और स्पर्श अक्सर हुआ करती है। मैं इन दिनों यादों से खंगाल कर स्पर्श के कुछ टुकड़े रख रही हूँ। एक बेतुकी सी डायरी की तरह। आपके वक़्त की क़ीमत ज़्यादा है तो इसे यहाँ जाया ना करें। ये बस यूँ ही लिखा गया है। इसका हासिल कुछ नहीं है। एक सफ़र है, जिसके कुछ पड़ाव हैं। बस 
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मेरा बचपन देवघर में बीता है। सेंट फ़्रैन्सिस स्कूल, जसिडीह। इसके बाद देवघर में बारहवीं की पढ़ाई करने के लिए ढंग के स्कूल नहीं थे और पापा का ट्रान्स्फ़र हो गया और हम पटना आ गए। पटना में सेंट जोसेफ़्स कॉन्वेंट में मेरा अड्मिशन हो गया। अभी तक मैंने को-एड में पढ़ाई की, जहाँ लड़के लड़कियाँ सारे साथ में थे। मगर ये सिर्फ़ लड़कियों वाला स्कूल था। मुझे अभी भी मेरा पहला हफ़्ता याद है वहाँ का। चारों तरफ़ इतनी सारी लड़कियाँ। इतना शोर। एक तरह से कह सकते हैं, मैंने उम्र भर के लिए लड़कियों से कहीं मन ही मन में तौबा कर ली थी। मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा था। लड़कियों की एक अलग क़िस्म की दुनिया थी, अलग क़िस्म की बातें जिनसे मैं एकदम अनभिज्ञ रही थी अभी तक।

इसी स्कूल में पहली बार ठीक ठीक तारीके से लेसबियन और गे के बारे में पहली पहली बार सुना था। हमारे बैच में दो लड़कियाँ थीं जो हमेशा एक दूसरे के साथ रहती थीं। ख़बर गरम थी कि उनके बीच कुछ चल रहा है। इस चलने का पता इससे चलता था कि वे हमेशा एक दूसरे से चिपकी हुयी चलती थीं। हाथ पकड़े रहती थीं। कभी एक दूसरे के बालों से खेलती रहती थीं। क्लास में भी हाथ पकड़ कर बैठी रहती थीं। इस स्कूल में आने के पहले मैंने ये जाना था कि किसी लड़के को छूना या उसके साथ ज़्यादा क्लोज़ होना बुरा है। कि इससे कह दिया जाएगा कि तुम बुरी लड़की हो, तुम्हारा किसी के साथ कुछ चक्कर चल रहा है। लड़कियों के साथ सटना घर परिवार या मुहल्ले में बुरा नहीं माना जाता था। लड़कियों के साथ बिस्तर में लेटे लेटे बात की जा सकती थी। उनकी गोद में सर रखा जा सकता था। वे आपके बालों को सहला सकती थीं। लेकिन ऐसा किसी लड़के के साथ करना गुनाह था। मगर स्कूल में देखा कि सिर्फ़ लड़के ही नहीं, किसी लड़के के साथ भी ज़्यादा टची होना ख़तरे से ख़ाली नहीं है। उस उम्र में हम चीज़ों को समझ रहे होते हैं। अपनी धारणाएँ बना रहे होते हैं। तो इस सिलसिले में जो चीज़ सबसे ज़्यादा आपत्तिजनक पायी गयी थी, वो था स्पर्श। आप मन ही मन में जो सोच लें आप उसे छू नहीं सकते हैं। स्पर्श की सीमारेखा खींची जा रही थी। पर्सनल स्पेस डिफ़ाइन हो रहा था। 

मैं उस स्कूल में बिलकुल अजस्ट नहीं कर पायी थी। सिर्फ़ दोस्तों के हिसाब से ही नहीं, पढ़ाई के हिसाब से भी। जहाँ अब तक मैं टॉपर रही थी, यहाँ की पढ़ाई समझ नहीं आ रही थी उसपर क्लास में कोई दोस्त नहीं थी जिससे कुछ मदद भी मिले। हाँ, यहाँ हमारी लाइब्रेरी बहुत अच्छी थी। मैंने पहली बार रोमैन्स नावल्ज़ पढ़े। मिल्स ऐंड बून बहुत सी लड़कियाँ पढ़ती रहती थीं और हरलेक्विन रोमैन्सेज़। मुझे मिल्स एंड बून बहुत ही हल्का और सतही लगा लेकिन हरलेक्विन पढ़ना मुझे पसंद था। ये इरॉटिका की कैटेगरी के नॉवल थे। घर में मेरी मम्मी मेरी लाइब्रेरी की सारी किताबें पढ़ जाती थी। अब उसे जब रोमैन्स उठाए तो डांट पढ़ी कि ये क्या सब घटिया किताब पढ़ती रहती हो। यहाँ पर स्कूल मेरी मदद को आया कि घटिया है तो स्कूल लाइब्रेरी में क्यूँ रखा है? ये सब भी पढ़ना चाहिए। लाइफ़ का हिस्सा है, वग़ैरह वग़ैरह। एक लेखक के हिसाब से कहें तो उन किताबों ने मुझे दो चीज़ें सिखायीं, स्पर्श को समझना और इंसान की प्रोफ़ायलिंग। आज भी किसी हीरो का डिस्क्रिप्शन उन रोमैन्स नावल्ज़ में जैसा देखा था वैसा कहीं नहीं देखा। उन्हीं नावल्ज़ ने स्पर्श को मेरे लिए डिफ़ाइन भी किया। वहाँ स्पर्श के कई हज़ार रंग थे। एक तरह की डिक्शनेरी कि जिसमें बदन के हर हिस्से के टच का वर्णन था। फिर यहाँ असल ज़िंदगी थी जहाँ हम किसी को भी नहीं छू सकते थे...हर तरह का स्पर्श वर्जित स्पर्श था। 

गर्ल्ज़ स्कूल में होने के कारण बहुत सी और चीज़ें शामिल होने के लिए लड़ाई कर रही थीं। इनमें से पहली चीज़ थी वैक्सिंग। ११वीं में पढ़ने वाली लड़कियाँ अपने हाथ और पैर वैक्स कराती थीं। स्कूल की ड्रेस घुटने से चार इंच ऊपर की छोटी स्कर्ट और शर्ट हुआ करती थी। मुझे घर से कभी उतनी छोटी स्कर्ट की परमिशन नहीं मिली लेकिन फिर भी मुझे अपनी ड्रेस काफ़ी पसंद थी। नीले रंग की चेक्स थी। स्कूल की बाक़ी लड़कियाँ अपने वैक्स की हुयी टांगों और छोटी स्कर्ट्स में बहुत सुंदर लगती थीं। मैंने अपनी ज़िंदगी में उससे ज़्यादा ख़ूबसूरत पैर कभी नहीं देखे। काले जूते और सफ़ेद सॉक्स कि जो फ़ोल्ड कर एकदम नीचे कर दिए जाते थे। उन दिनों पटना में ऐंकल सॉक्स नहीं बिकते थे। नोर्मल मोजों को बेहद क़रीने से फ़ोल्ड करके नीचे कर दिया जाता था। हाईजीन पर भी डिस्कशन उन दिनों का हिस्सा था। जो लड़कियाँ वैक्स करती थीं उन्हें बाक़ी लड़कियाँ जो कि वैक्स नहीं करती थीं उनके हाथ खुरदरे लगते थे। पैरों की तो बात ना ही करें तो बेहतर। वैक्सिंग में होने वाले दर्द का सोच कर ही रौंगटे खड़े हो जाते थे। मैंने कभी वैक्स नहीं किया और हमेशा लगता रहा कि मेरे हाथ चिकने नहीं हैं, खुरदरे हैं...ये बाल किसी को बुरे लगेंगे। जबकि मैं इतनी गोरी थी कि मेरे हाथों पर सिर्फ़ हल्के सुनहरे रोएँ थे। मगर उन दिनों लगने लगा था कि सबको सिर्फ़ वैक्स किए हाथों वाली लड़कियाँ अच्छी लगती होंगी। इतना सुंदर अपना चेहरा नहीं दिखता था मुझे भी। कोम्पलेक्स होती जा रही थी मैं। उलझी हुयी। कहाँ कौन मिलता कि जिससे पूछती कि हाथ वैक्स किए बिना तुम्हें अच्छे लगते हैं या नहीं। 

स्कूल में लेस्बो कह दिया जाना इतनी बड़ी गाली थी कि लड़कियों का भी आपस में गले मिलना हाथ मिलाना या हाथ पकड़ के बैठे रहना कम होता गया था। जो नोर्मल सी आदत थी कि किसी ने शैंपू किया है तो पास जा के उसके बाल सूंघ कर कह सकूँ  बहुत अच्छी ख़ुशबू आ रही है वो भी बंद हो रहा था। ये दो साल ऐसे ही बीते। फिर एक साल मेडिकल की कोचिंग के लिए ड्रॉप किया। यहाँ एक साल थोड़ी जान आयी कि कोचिंग में लड़के थे। जिनसे पढ़ाई लिखाई की बात हो सकती थी। डॉक्टर बन कर हम क्या करेंगे की बात। फ़िज़िक्स की केमिस्ट्री की बात। वे ज़िंदगी में क्या करना चाहते हैं वग़ैरह की बातें। एक नयी चीज़ यहाँ की दोस्ती की थी कि हाथ पकड़ के चलना नोर्मल माना जाता था। मुझे ठीक ठीक मालूम नहीं क्यूँ या कैसे। लड़के लड़कियाँ साथ में कभी कभार सिंघाड़ा खाने जाते थे तो किसी का हाथ पकड़ कर चल सकते थे। उन दिनों ये आवारगर्दी में गिना जाता था। मगर ये आवारगर्दी मुझे ख़ूब रास आती थी। 

इस बीच ये भी हुआ कि कोई लड़का बहुत पसंद आने लगा। क्लास में डेस्क में किताबें रखने वाली जगह पर हम हाथ पकड़े बैठे रहते थे। उसने मेरा हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा होता था कि अँगूठी के निशान पड़ जाता था। कभी कभी तो लगता था नील पड़ जाएगा। ज़िंदगी में पहली बार स्पर्श के रोमांच को महसूस किया। उसके साथ चलते हुए हाथ ग़लती से छू भी जाते थे तो जैसे करंट लगता था। उन दिनों इसे स्टैटिक इलेक्ट्रिसिटी का नाम देते थे हम। लेकिन बात ये कुछ केमिस्ट्री की होती थी। उन्हीं दिनों पहली बार ध्यान गया था कि स्पर्श कितना ज़रूरी होता है। उससे अलग रहना कितना तकलीफ़देह होता था। हम उन दिनों भी मिलते थे तो सिर्फ़ हाथ मिलाते थे। पटना जैसे शहर में ऐसी कोई जगह नहीं थी जहाँ एक लड़की एक लड़के से गले मिल सकती हो। ये सबकी नज़र में आता था और फिर बस, बदनामी आपके पहले घर पहुँच जाती। उन दिनों पहली बार महसूस किया कि ऐसी कोई जगह हो जहाँ उससे एक बार गले मिल सकें। एक बार चूम सकें उसको। उसके काँधे पर सर टिका कर बैठे रहें कुछ देर। हम जिस टच फोबिक दुनिया में रहते थे, वहाँ उसे चूम लेने का ख़याल गुनाह था। गुनाह। 

और हमने इस गुनाह की सिर्फ़ कल्पना की...अफ़सोस के खाते में दर्ज हुआ कि बेपनाह मुहब्बत होने के बावजूद हमने कभी उसे चूमा नहीं। जिस दिन ब्रेक ऑफ़ हुआ और वो आख़िरी बार मिल कर जा रहा था, उसने मेरा हाथ चूमा था। उसके चले जाने के बाद हमने अपने हाथ को ठीक वहीं चूमा...और थरथरा गए। एक सिहरन बहुत देर तक गहरे दुःख और आँसू में महसूस होती रही।  उन्हीं दिनों सोनू निगम का गाना ख़ूब सुने, 'तुझे छूने को दिल करे...'


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